कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1794

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राख की रस्सी ही है प्रेम

राख की रस्सी ही है प्रेम.... गले में पहनी भी और बँधे भी नहीं। कल्पना 💐💐💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें