कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 1774

भाषा / Language

तुम्हारे लिए "सिफर " होंगी

तुम्हारे लिए "सिफर " होंगी...... पर खुद के लिए "सफर" बन गयी हूँ दिन में .....चाँद बनकर रात में ....सूरज बनकर रुक रुक कर चलने वाला नहीं ठिठक ठिठक कर गुजरने वाला बदल लिया है खुद को जाने कौन सी हद तलक उस सिफर से होते हुए....... इस सफर तलक अब .....रात में सूरजमुखी हूँ और दिन में रात रानी भी और इन दोनों के बीच ......ना जाने क्या क्या कभी यूँ ही ...... किसी रोज़ इस दिन की चमक उस रात की दमक हटा कर देखना मेरे चाँद से माथे पर सूरज उगा मिलेगा अगर मुझे बूझ पाए तो..... ठीक अगर मुझे देख पाए तो ......ठीक वर्ना हो सकता है ..... तुम्हें सिफर पर इक और सिफर लगा मिलेगा
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें