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रचना 1745

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बस दो ही कदम तो चली थीं मैं

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बस दो ही कदम तो चली थीं मैं .... एक में रुक गई दूजे में बस गई इन दोनों कदमों के बीच न जाने कितनी बार खुद से कहा ......... मैं तुम्हें फिर मिलूंगी। तुमने भी सुना क्या ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें