कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1698

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मैं तो........ "कल्पना "हूँ

मैं तो........ "कल्पना "हूँ बोझिल मन जब बंट नहीं पाता दुविधा का रास्ता पट नहीं पाता कहा - अनकहा सब व्यर्थ सा निर्जीव शब्दों के अर्थ सा जी करता है "झील "हो जाऊं उलझन अपनी तह में छुपाऊँ अपनी काई संयम से हटाऊँ कुछ घुटन किनारे लगाऊँ बस शांत हो जाऊं पर मैं तो "कल्पना "हूँ..... आने वाले कल का अद्भुत सपना हूँ आँखों में "समुंदर " लिए फिरती हूँ अपने हिस्से की ख़ुशी लिए मचलती हूँ चुटकी में मैं "नदी "हो जाती हूँ "झील "वाला चेहरा पोंछ आती हूँ नैनों में आस लिए होठों में मुस्कान लिए पथरीले हो या कंटीले हर पल को जीने के लिए " झील "वाली काई किनारे लिए " नदी "वाली जिद्द भीतर लिए " समुंदर "वाली चाह अपने लिए
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें