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रचना 1685

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माँ का दिल फ़िक्र से बना होता है। उसका दिल छोटा पड़ जाए पर आँ…

माँ का दिल फ़िक्र से बना होता है। उसका दिल छोटा पड़ जाए पर आँचल छोटा नहीं पड़ता। आसपास कितना भी बाड़ा लगा ले माँ पर उसकी अपने बच्चों के लिए फिक्र रुक नहीं पाती। वो अंदेशे में भी अपने बच्चों को सकुशल चाहती है। ज़िन्दगी को जब भी उचक कर देखती है माँ तो खिड़कियों से अच्छा कम, बुरा ज्यादा आसपास पाती है। उसकी फ़िक्र का असुरक्षा में बदल जाना लाज़मी हो जाता है, जब वो वक़्त और इंसान को झटपट बेशर्मी से बदलते हुए देखती है। ना चाहते हुए भी वो अपनी फ़िक्र को अपने आँचल से भी लंबा कर देना चाहती है और रहना चाहती है अपने बच्चों की निगहबान बन कर।एक parallel आकाश की तरह वो अपने बच्चों पर रह जाना पसंद करती है। मन वही हो जाता है .....जो देखता है और बुनने लगता है शक और संदेह ।आसपास के रिश्तों में मिलावट और कपट देखकर स्त्री अपने मन से पहले अपने घर के द्वार बंद कर देना चाहती है । कल्पना😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें