कल्पनाशब्दों के बीच
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मेरे पास लौटने के लिए तुम्हारा वाला शहर नहीं था और तुम्हारे…

मेरे पास लौटने के लिए तुम्हारा वाला शहर नहीं था और तुम्हारे पास मेरा वाला मौसम ....शायद उम्र भी ताउम्र एक ही ज़ख्म कब तक धड़कता ? चारागर बदलते रहे ... सांस आती रही। कल्पना💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें