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रचना 1654

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आज बहुत दिनों बाद @कल्पना लाइव के लिए फिर कुछ प्यार भरे शब्…

आज बहुत दिनों बाद @कल्पना लाइव के लिए फिर कुछ प्यार भरे शब्द मिले। बहुत बहुत आभार रूचि बहुगुणा उनियाल जी। आपका प्रेम आपके सुझाव सब अंतस में संजो लिए।😊😊😊😊😊 @ कल्पना लाइव__ एक पाठकीय टिप्पणी _::,,, रूचि बहुगुणा उनियाल :::,,,, नरेन्द्र नगर _______--------____________--------__________ सुश्री कल्पना पांडेय का प्रथम प्रयास @ कल्पना लाइव एपीएन पब्लिकेशन से सद्यः प्रकाशित काव्य संग्रह है। {ISBN_978_93_85296_80_2} कुल पृष्ठ 104 और हार्ड बाउण्ड प्रति का मूल्य रूपये 220.00 मात्र। इस अद्वितीय काव्य संग्रह में कुल 69 कविताएँ हैं अपनी तरह की अनुपम! प्रथम पुस्तक के प्रकाशन पर आपको सर्वप्रथम मैं बधाई और शुभकामनाएँ प्रेषित करती हूँ कल्पना पांडेय जी💐💐😊 पूरी पुस्तक को प्रथम बैठकी ही आद्योपांत पढ़ती चली गयी मैं! और आत्मसात किया और दो बार पढ़कर शब्द शब्द को जैसे घूँट _घूँट पिया जाए स्वादिष्ट पेय! कवियित्री का रेचनकर्म उच्चतर स्तर का है और वे अपनी बात को कम से कम शब्दों में कह देने की कला में निपुण हैं। भाषा प्रेम की और शैली तुरत काव्य रेचन की प्रथम दृष्टया,, कुछ रचनाओं में अधिक समयावधि लिए किया गया काव्य सृजन भी संभवतया! मुझ से मुझ तक में कवियित्री कहती हैं कि शब्द और एहसास के बीच की बहुत सारी खाली जगह मुझमें जमा रह गयी होगी शायद इसीलिए एक दिन कविता भर गयी दरमियाँ………..! अपनी बात कहने को भी पूरी तरह काव्यात्मक शैली का प्रयोग रचयित्री ने किया है मुझ से मुझ तक में एक उदाहरण देखिए…..,,, "जाओ थोड़ा एकांत उठा लाओ इन शब्दों को हद में रहने का सलीक़ा तो आये!" है न अद्भुत! उलाहने, प्रेम प्रतीक्षा, स्त्री, शब्द, मोहब्बत, इश्क, एकालाप, प्रेम व्यंग्य, दर्शन क्या कुछ नहीं! कुछ लिखना उनके काव्य सृजन पर ऐसा होगा जैसे कि सूरज रौशनी के लिए जुगनुओं के घर जाए! यद्यपि सारी कविताओं को न उध्दरित करूँगी क्योंकि इससे पाठकों की पुस्तक पढ़ने की जिज्ञासा समाप्त हो जाती है। तथापि कुछ रचनाएँ हैं जिन्होंने मुझे बहुत आनंदित किया उन्हें यहाँ उल्लेखित करना चाहूँगी! सबसे अधिक प्रभावित किया इस कविता ने मुझे,, कुछ पंक्तियों में ही एक सम्पूर्ण रचना व्यंग्य करती सी कुछ! "दिन के उठने से कई घंटों पहले अपना सूरज उगा लेती हो और देर रात तक…… इन तारों को बुहारती रहती हो ज़िन्दगी…. तुम भी 'औरत' हुए जा रही हो! एक सम्पूर्ण रचना! अद्भुत भाव और अर्थ समेटे हुए! बधाई कल्पना जी💐💐 अंतिम रचना इस संग्रह की,, " दिन भर शब्दों का मौन ढोती हूँ। फिर देर रात थकान काग़ज़ पर रख देती हूँ। कल्पना का अलाव जलाता है कोई। सुकून _सा लगता है। बची_खुची राख…. कविता हो जाती है!" अद्वितीय, अद्भुत रेचन! 👏👏 एक रचना और इस काव्य माल से ही यह भी…. "अब अब कुछ देर तुम धूरी बने रहो….. मैं परिधि बनना चाहूँगी। अपने हिसाब वाली दूर…. पास खुला… बंद अंदर…. बाहर ये केवल विलोम तो नहीं होते होंगे? है ना? लाओ इन्हें कुछ देर विशेषण कर लूँ।" वाह उत्तम! "ये…."मैं" ही हो सकती हूँ… जो शब्दों के ज़रिये अपना कुछ हिस्सा वज़ूद… पिरो सकती हूँ तुम में अपना कुछ अंश… खो सकती हूँ तुम में" अद्वितीय! "दुख लिखना कितना तो आसान है पर उसके धब्बों को तुम्हारी कमीज पर टाँकना इस भरी दुनिया के लिबास में काढ़ना… कितना मुश्किल जिम्मेवार और जिम्मेदार में फर्क जान गई हूँ इसलिए…. अब से तुम ख़ारिज दुनिया हमेशा के लिए बर्खाश्त और मैं…. मैं… सिर्फ आज के लिए मुल्तवी हूँ" बेहतरीन! " कभी आना चाहो मुझ तलक तो… इसी रस्ते आना और सुनो! 'हम' नाम की 'तख्ती' ढूँढ़ना जल्दी पहुँचोगे बिना बूझे इक बात और… मेरी तरह 'सुकून' से आना जानते तो हो…. मुझे 'शार्टकट्स'.... और… 'रैश ड्राइविंग' से कितनी चिढ़ है " अहा लाजवाब! " सीली हैं अभी तक जरा इत्मीनान से पढियेगा…… ये पंक्तियाँ….. गीली हैं अभी तक " निःशब्द! निःशब्द! रिश्तों में मरती संवेदनाओं को उकेरती रचना है "पीले पड़ते रिश्ते" एक और,,,...... "कई दिन हुए वक़्त गीला_ सा है फिसल नहीं रहा मन जमा_सा है पिघल नहीं रहा नकाब ओढ़ा _सा है ढल नहीं रहा "! निःशब्द हूँ आपको पढ़कर कल्पना जी! उत्कृष्ट सृजन के लिए बधाई आपको 💐💐 इस टिप्पणी को समीक्षा न समझा जायेगा यही आशा है! पुस्तक में कुछ जगहों पर छपाई के सामान्य दोष भी हैं जो कि मुझे नज़र आये। आशा है कि रचयित्री इसे अन्यथा नहीं लेंगी और मात्र एक पाठक की टिप्पणी की दृष्टि से स्वीकार करेंगी। कुछेक हैं जिन्हें मैं यहाँ उल्लेखित कर रही हूँ यथा __ कई रचनाओं में अनुस्वार और अनुनासिक के भेद को भुलाया गया है जहाँ चँद्रबिंदु और अं का भेद होना चाहिए। पृष्ठ संख्या 21 में रचना "मायावी है… कल्पना!" में बूढ़ी के स्थान पर "बूढी", बुढ़ाने के स्थान पर "बुढाने", पृष्ठ संख्या 23 में ख्वाहिश के स्थान पर "ख्वाइश", पृष्ठ संख्या 25 में कतई के स्थान पर "कत्तई", पृष्ठ संख्या 38 में लफ्ज़ के स्थान पर "लज़", पृष्ठ संख्या 46 में बावरी के स्थान पर" बांवरी" और इसी रचना में जगह _जगह बूँद के स्थान पर "बूंद", खुशियाँ के स्थान पर "खुशियां" और एक रचना में बर्खास्त के स्थान पर" बर्खाश्त",, एक रचना जो मुझे बहुत अच्छी लगी उसमें धुरी के स्थान पर "धूरी" अंकित हो गया है जो कि सामान्य मुद्रण व टंकण के दोष हैं। पुनःश्च आपको इस अनुपम काव्य सृजन की हार्दिक शुभकामनाएं व बधाई प्रिय कल्पना जी💐💐आशा है कि आपकी लेखनी से अनवरत फूटेंगी शब्द बेलें और रचेंगी आप नित नूतन काव्य पुष्प 💐💐😊 इति शुभम् रूचि बहुगुणा उनियाल नरेन्द्र नगर दिनांक _२५_०७_२०१९
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें