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रचना 1645

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कितने भी धागे बाँध लूँ इस मन पर

कितने भी धागे बाँध लूँ इस मन पर बाँध बाँध कर ऊन का गोला भी कर दूँ ... ये लुढ़कता तेरी ही ओर है। बुद्धू न हो तो😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें