कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1630

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स्त्री आंखों में आजीवन एक महल बुनती रहती है ।

स्त्री आंखों में आजीवन एक महल बुनती रहती है । हर सुबह एक कोने से शुरू होकर शाम तक एक कमरा तैयार कर लेती है। जैसा भी मिले.....जो भी मिले । हद खूबसूरत... खुशी खुशी । उम्र भर के कमरे जुड़े जुड़े "महल" ही हुए ना। मुस्कुरा रही देखो। है एक शब्द "मकबरा" भी .... महल से मिलता जुलता ।पर उसने कभी पढ़ा ही नहीं शायद या ....शब्द कोष का वो पन्ना उसने खुद चिपका दिया हो अपनी वर्जनाओं से अपनी चाहनाओं से आंखें....दोषी हैं ।स्त्री नहीं... कल्पना💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें