कल्पनाशब्दों के बीच
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बेसाख्ता मुहब्बत है ,उसके नूर पे नाज़ है

बेसाख्ता मुहब्बत है ,उसके नूर पे नाज़ है ज़िन्दगी का हर दिन ,मेरा खूबसूरत आज है बहुत सख्त हैं मेरे पैमाने ,मैं बख्शती नहीं ज़िन्दगी हूँ , सिर्फ तेरे लिए ही लिहाज़ है संस्कार में लिपटी पतंगें ,क्या खूब रंगत है ये हमारी बेटियों की ऊंची परवाज़ है दौलत और कुर्सी भी क्या खूब नशा है चूहों ने अब तक न छोड़ा डूबता जहाज़ है मसरूफियत ज़िन्दगी की ,शौक बूढ़ा गए थकते से हाथों में ,जंग लगा साज़ है नमक की डली सा मेरा वजूद ,तू पानी है घुल जाती हूँ तुझमे ,सदियों का रिवाज़ है कल्पना💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें