कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1623

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बस कीजिये शब्दों का मांझा खींच लीजिये ।

बस कीजिये शब्दों का मांझा खींच लीजिये । नासमझ नहीं हैं..... बस समझना नहीं चाहते हैं। हवा बदलने दे दीजिए जादूगर।एक जैसी सांसें अब दिलकश नहीं लगती। हम ही पागल थे जो सुनने चले थे तुम्हारी आंखों से झरती कहानियों की खनक।पकड़ने चले थे तुम्हारी गमक । प्रेम में पड़ना फ़िज़ूल कब नहीं था। एक बार फिर दर्द बयां करने का बहाना अच्छा मिल गया। चलो दूर हटो। हमें दूसरा पन्ना पलटना है। तुम खेलो शब्दों से ।हम दिल ढूंढते हैं अपने लिए। शायद गलत कह गए... टुकड़े ढूंढते हैं अपने लियेे। सुनो! अबकी यादें लेंगे। वादे रंग बदल लेते हैं। और शब्द ..... ना बाबा ना... ये तो बैरी हैं। डोरे डाल देते हैं। काला जादू अब मैं करूँगी। तुम बस देखना... बस गई और आई..... कल्पना💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें