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मुफ़्त नहीं मुक्त ....भय मुक्त सफर की दरकार है।

मुफ़्त नहीं मुक्त ....भय मुक्त सफर की दरकार है। जाने दीजिए सरकार ... आप तो शिकंजा कसिए। एक बात और... ओ स्त्री ! तुम मुफ्त कभी मत जाना। मुफ़्त का मतलब समझती हो ना ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें