भाषा / Language
एक बूंद इत्र और डेढ़ बूंद ज़हर से ढाई आखर लिख देना
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एक बूंद इत्र और डेढ़ बूंद ज़हर से ढाई आखर लिख देना .....
अहा...
बंद धड़कन और रुके कदमों से प्रेम तुम तक पहुंचता कैसे है ?
सुनो कुछ शब्द भेज दो .....
वो जो हमारी आधी अधूरी नज्म रह गयी थी ना.......
वो टूट गयी है
कई साल भी तो हो गए .......तुमसे ना बोले हुए
इतने हुनर थे आसपास
प्रेम उनमें सबसे चमकीला ठग रहा।
कुछ अर्जियाँ कितनी ठोस होती हैं ...
तेज़ बारिश में भी गल जाती हैं और कड़ी धूप में भी..
उतनी ही शिद्दत से
रोज़ रोज़....
अधूरे अधूरे खुदा बनने से अच्छा
इक दिन ...
पूरे पूरे इंसान बन कर देखते
मैं बेहतर समझ आती ......शायद
उससे मैं अक्सर हारना पसंद करती हूँ जिसे जीतने की ज़िद्द ठान लेती हूँ।
खुदा तो यूं भी मिल जाया करता है।
वैसे तो ...."ख़ामोशी"
तीन ही अक्षरों पर टिकी है
पर इसमें अनंत शब्द रोक देने की क्षमता है
है ना?
हर मनचाहा शख्स आपकी कहानी में किरदार ही निबाहे जरूरी तो नहीं।कुछ बस यूँ ही फेरा लगाने आते हैं ....रुकने नहीं। हाँ...उनके नाम कुछ शब्द जरूर कहानी में शामिल हो जाते हैं। वो खाली पन्ने उन्हीं से भरते जाते हैं।
किताब में कहानियां होती हैं ..तो किस्से भी तो होते हैं..छोटे छोटे कुछ मुकम्मल कुछ फ़िज़ूल।
अच्छा हुआ तुम शब्द थे ... शख्स होते तो कविता ही नकार देती।
माना प्रेम और प्रतीक्षा एक दूसरे को प्राप्य हैं ।
पर...
कितना
किसको
कैसे
क्यों
कब तलक
और क्यों नहीं ?
इसमें पड़े दो लोगों के बीच का प्रारब्ध होता होगा शायद।
मेरा वाला सैलाब बुलबुलों से ही बन जाता है
तुम नहीं समझोगे....
यादों का पुराना कारोबार है मेरा
कल्पना💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें