कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1560

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मैं कौन

मैं कौन? तुम ...तुम एक अनुशासित पंक्तिबद्ध ... चुप तराश और ख़राश को लयबद्ध करती हुई व्यंजन को स्वर देती हुई स्वर को व्यंजन तुम...तुम अपार अक्षय को न्यून करती हुई जीवित कविता मुक्ति को आसक्ति कहती हुई आसक्ति को मुक्ति तुम कौन? मैं ..मैं .. द्वार द्वारा द्वारपाल सब कुछ.... कल्पना💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें