कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1540

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मैं उससे बंधी हूँ ... पर वो मुझसे मुक्त है।

मैं उससे बंधी हूँ ... पर वो मुझसे मुक्त है। कुछ कीलें चुभती नहीं पर टेक जरूर देती हैं। -------------------- दुनिया को ज़माना होते देर ही क्या लगती है ? बस नज़रें ही तो फेरनी है। -------------------- उसे पहले से ही किसी की शिकायतें पसंद नहीं थी ।फिर सारी प्रार्थनाओं से भी वह उचट गया। उसे जवाब ना देने की अजीब बीमारी थी । उसने संवाद वाला प्रेम कभी अपनाया ही नहीं। शब्दों को गुमशुदा कर देना उसकी बेहतरीन आदतों का हिस्सा था। उसे अपनी सारी प्रेमिकाएं मूक ही पसंद थी। निर्मोही ! तुम्हारे शब्दों का इंतज़ार रहेगा। प्रेम तुम्हारे हिस्से में भी कम ही रहे। खर्च न हो। कल्पना💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें