ककल्पनाशब्दों के बीच
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हमारे दिल तो हमेशा से ही मिले हुए लगते थे पर दिल का सांचा ए…

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हमारे दिल तो हमेशा से ही मिले हुए लगते थे पर दिल का सांचा एक दूसरे के लिए नहीं बना था। ये ठीक वैसा ही था कि मेरे अफसानानिगार के पास अनगिनत कहानियाँ थी पर हमारे बीच शब्द गिनती के ही रखना पसंद था उसे। याद नहीं कि कभी शुरुवात उसने की हो ।हर बार सब्र मेरा ही टूटा। ये अलग बात है कि जवाब हर बार आया। चाहे एक स्माइली हो या एक शब्द । अब ये मेरा हुनर था कि एक स्माइली से मैं अगले कई दिनों का सुकून बुन लेती थी और एक शब्द से कई मरहम । इस प्रक्रिया ने मुझे अधीर ना होना सीखा दिया। अब मैं चुप्पी लिखना और पढ़ना सीख गई हूं । एक शब्द के आगे पीछे प्रेम का समंदर भरना आसान कर दिया है तुमने । मोगरे ही तो लिखने थे तुम्हें याद करते हुए। लो लिख दिए। मेरे अफसानानिगार ....महक पहुंचे तुम तक दुआएं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें