भाषा / Language
अंध भक्ति का भी
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अंध भक्ति का भी
क्या खूब नज़ारा है
बस उस नेता की बिना
ही न जैसे हमारा गुज़ारा है
आँखों में पट्टी बंधी
ये भेड़ें क्या दीवानी है ?
कुछ देर रुको बस
तुम्हारी ही कुर्बानी है
ये बिरादरी
पानी का बुलबुला नहीं
लकीर बेमानी है
पांच दिनों का जलसा
फिर पांच बरस की वीरानी है
मैं ....
मेरा ......
मुझ सा कोई नहीं प्रतिभागी
इक मैं ही आईने सा साफ़
बाकी जो हैं .....सब हैं दागी
अपने को बेचने में
नेताओं ने
करोड़ों फूंक डाले
अब कहते फिर रहे हैं
हम हैं सेवक
करो देश हमारे हवाले
कोई नहीं ऐसा जो
आजमाइशों में खरा उतरे
नज़रों से कब का गिर गया
फिर फिर कुर्सी पर पसरे
अब ये जाना
कि हुज़ूरे आला
सफ़ेद क्यों पहनते हैं
मरे हुए लोगों की
मरी हुई उमीदों पे
वो मरे मरे
भूत से जो फिरते हैं
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें