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शिखर से मैदान तक

शिखर से मैदान तक...... सफलता के शिखर पर पैर रखते ही , जिस ओर देखा , सब को अदना , सब कुछ आसान पाया खुद चोटी पर टंगा हुआ , कुछ को लटका , कुछ को मैदान में जमा पाया नज़रें उठी , सामने कुछ मुझ जैसे , और सफलतम शिखरों का झुण्ड नज़र आया ...... सभी टंगे हुए , बस खड़े रहने की जद्दोजहद करते हुए , अकेले अपने आप से लड़ते हुए , दूसरों से जलते हुए , कभी खुद जलाते हुए, एक दूसरे से ना बोलते हुए , सिर्फ सफलता तौलते हुए नज़रें झुकी , कुछ प्रयासरत , कुछ कम सफल लोगों का हुजूम नज़र आया...... कोशिश करते हुए , एक दूसरे को ढाढस देते हुए, एक दूसरे से सीखते हुए , कभी यूँ ही बतियाते हुए , मैदान में दूर दूर तक फैले हुए, आँखों में सपने बोते हुए , सिर्फ परिश्रम करते हुए , मैं शिखर था ...... बस मैदान में उतर आया , नयी सोच लिए , ये सफ़र चुटकी में पाट आया आज जब लौटा हूँ , संगी साथ लाया हूँ , प्रयासरत कई हाथ लाया हूँ , शिखर आज पठार कर दिया , सुकून की बयार कर दिया , अब काफी जगह है , अब सफलता इक वजह है प्रयास अधिक है ,आस अधिक है उत्साह अधिक है ,राह अधिक है हाथ अधिक है ,साथ अधिक है हम सब निश्चिंत हैं सबके हिस्से में सफलता अधिक है
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें