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माँ की व्यथा

माँ की व्यथा ...... हैवानी समुंदर में , अपना मोती कैसे बचाऊँ बिटिया की माँ हूँ ,सोच के ही , सिहर जाऊं खुबसूरत है ये दुनिया , बतला तो रही हूँ घिनौना आस पास देखूं , खुद बिखर जाऊं कब तलक बंधी बंधी रखूं ये नन्ही चिड़िया ममता के मारे , कहीं पंख ही न क़तर जाऊं अल्हड लहर, उफनती ख्वाइशों सी है वो फख्र करूँ ,की फ़िक्र , मैं किस डगर जाऊं ? बिटिया का कथन...... कितना न्यून हुआ है वजूद मेरा वक़्त नहीं , ज़माना कहे की घर जाऊं अँधेरा तो फिर भी नोच लूँ अपना अंधेर हो जाये ,तो बता किधर जाऊं ? फिक्रमंद हैं , परियां भी अर्श की भूल से ऐसे फर्श पर न उतर जाऊं मुदत्तों से , इक फरक दिखा है मुझको गिला इक यही लिए , खुदा के नगर जाऊं
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें