कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1293

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उस तक पहुंचने के लिए मैंने खुद शब्दों के पुल बुने और खुद ना…

उस तक पहुंचने के लिए मैंने खुद शब्दों के पुल बुने और खुद नाखूनों से खुरच खुरच कर उधेड़ दिए। आप पास पहुंच तो सकते हो पर दूरी कम नहीं कर सकते। किसी के भीतर ओस रखनी हो तो जमकर बरसना पड़ता है.... कह देने से दुःख कम होता है....प्रेम ज्यादा नहीं होता। आईने को हम इस लिए भी दिलकश लगते हैं क्योंकि कई खुदाओं से मिलने के बाद खुद से मिलते हैं। अपना कहा पुल ही तो है ..... देखो फिर कहा ....तुमसे फिर पहुंची ....तुमतक फिर उंगलियों के पोर हिले और वापस लौट आयी प्रेम की खुरचन....मैं । आती हूँ....कल फिर😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें