कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
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रचना 1263

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कभी कभी होता है ऐसा भी

कभी कभी होता है ऐसा भी ... कि मेरे शब्द भी इक खिंचाव महसूस करते हैं पता नहीं क्यों .... पता नहीं किसके लिए .... खाली हो जाना चाहते हैं फिर फिर भर जाने के लिए .... कोई चेहरा नहीं कोई आवाज भी नहीं कोई अतीत कोई वर्तमान भी नहीं पर हैं कुछ शब्द शब्द नहीं ......शब्द विशेष जो पिघल जाना चाहते हैं खुद को ठोस करने के लिए .... ऐसा नहीं की तलाश रहे हैं कुछ या खो दिया है कुछ ... बस .....इक सुगबुगाहट बस ....इक आहट कि हूँ ..... मैं यहीं कहीं हूँ तुम्हारे शब्दों कि बाट जोहता शब्दों से बहकना और शब्दों से बहल जाना बस यही सीख पायी हूँ आज तलक और देखा ....आज फिर तुमने टरका दिया कुछ उलझे से शब्द भेज कर
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें