भाषा / Language
तुम लाख मुझे बसंत कहो
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तुम लाख मुझे बसंत कहो ....
मैं खुद को जानती हूँ... और वही रहना पसंद करती हूँ ....पतझड़ ।
पतझड़ .... इस लिए भी की ये मुक्त कर देना आसान कर देता है। बिना कोई प्रश्न पूछे।
और मुक्त होना ही सच्चा बसंत है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें