भाषा / Language
स्त्री आंखों में आजीवन एक महल बुनती रहती है ।
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स्त्री आंखों में आजीवन एक महल बुनती रहती है ।
हर सुबह एक कोने से शुरू होकर शाम तक एक कमरा तैयार कर लेती है। जैसा भी मिले.....जो भी मिले ।
हद खूबसूरत... खुशी खुशी । उम्र भर के कमरे जुड़े जुड़े महल ही हुए ना। मुस्कुरा रही देखो।
है एक शब्द मकबरा.... महल से मिलता जुलता ।पर उसने कभी पढ़ा ही नहीं शायद या शब्द कोष का वो पन्ना उसने खुद चिपका दिया हो शायद अपनी वर्जनाओं और चाहनाओं से।
आंखें....दोषी हैं ।स्त्री नहीं...
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें