कल्पनाशब्दों के बीच
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अक्सर वो गिरवी रख देती है कलम

अक्सर वो गिरवी रख देती है कलम .... सिर्फ और सिर्फ उसे सोचते हुए और बह जाती है अकेली ....कोसों दूर... संग बहा ले जाती है ... "एक शख्श वाला पूरा शहर" बस वही एक लोहा उसकी कविता में तैरता है और वो खुद एक लकड़ी की तरह डूब जाती है शब्दों के तह में एक ही दिशा में ......एक सरीखा बस कल्पना ही बह सकती है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें