कल्पनाशब्दों के बीच
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ववत की साख पर

ववत की साख पर लम्हे कभी कभी ही रुकते बारिश जैसे ...... बून्द बून्द में भर के हज़ारों ख्वाइशें जैसे.... इक दास्ताँ जम जाती है "ओस सी" इन पत्तों पर एहसास से ....भरे भरे भ्रम में ....हरे हरे बस रूक जाने की आरज़ू दबाये थम जाने की जुस्तज़ू दबाये ये बेतहाशा वाले लम्हे ये बेइन्तेहाँ वाले लम्हे इतनी कम उम्र लिखा के लाते हैं कि महसूस होते ही फिसलने लगते हैं बस बिखरने लगते हैं लाख कोशिश कर लो हाथों के बीच दबा लो , दिल में भींच लो , ये वक़्त से छीने हुए लम्हे बुलबुलों से उठते हैं और बैठ जाते हैं यादों की ठूंठ सी साख पर और एक बार फिर.... बेसमर वक़्त का दरख़्त अर्ज़ी रख देता है गिरते लम्हों की बीते लम्हों की कभी मुझ पर कभी तुझ पर
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें