भाषा / Language
कश्मकश
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कश्मकश ......
देहलीज़ के
इस तरफ
इक रुका हुआ ....समुन्दर
और
उस तरफ
बहता हुआ .....आकाश
"कश्मकश" में हूँ .....
रुककर .....बह जाऊं
या
बहकर.... रुक जाऊं
बहती ही जाऊं
या
बस रुक ही जाऊं
देहलीज़ की कश्मकश .....
मेरे हिस्से की कश्मकश .....
कुरेद कर लायी हूँ अपनी पेशानी में
जबकि जानती हूँ....
देहलीज़ भी ....किसी की
समुंदर भी .....कोई
आकाश भी ...किसी का
और मैं ....
मैं तो बस .....मैं हूँ
मैं हूँ भी ?
ये भी .....क्या कम कश्मकश ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें