भाषा / Language
अपने ही दुख को रेशा रेशा अलग करना और फिर उसे गूंथ कर खुद का…
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अपने ही दुख को रेशा रेशा अलग करना और फिर उसे गूंथ कर खुद का श्रृंगार कर लेना ही औरत हो जाना है।
ये ना तो हार है ना जीत .....
ये फ़ख़्र है जो आखिरी सांस तक औरत बांचती रहती है बिना लब हिलाए।
कोई सुन ले तो ठीक नहीं तो एक जोड़ा खूबसूरत आंखें भी तो लकीरों में धरा कर लायी है ।खोल देती है नल और दुख भी कितना तरल .....बांवरा बह जाता है रेशा रेशा
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें