कल्पनाशब्दों के बीच
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Unfilled Gaps

Unfilled Gaps ...... वो लड़की अकेली दिखती तो थी पर तन्हा होना उसके बस की बात न थी । ना ही उसे पसंद था। अक्सर उसकी तरफ हाथ ,आंखें, आवाज़ और कदम बढ़ते थे पर वो सिर्फ उन gaps को भरते थे जो फिर फिर ख़ाली हो जाते थे। और बार बार उसके एकाकीपन को bold letters में ज़ाहिर करने लगते थे।बस इसी लिए दूरी बनाये रखती थी वो सबसे। एक रोज़ लड़की कागज़ पर अकेले बैठे बैठे गोले बनाने लगी .... कुछ देर में कागज़ भर गया। उसकी आंखें चमकने लगी ।रिक्त से रिक्तता भरना उसे भाने लगा । धीरे धीरे लड़की उन सभी हाथों ,आंखों ,आवाज़ों और कदमों में अपने हिसाब से जी आना सीख गयी। जब जी चाहा हाथ थामा ।जब जी आया आंखें चूम ली।जब मन किया कदमों में लोट गयी जब मन न चाहा आवाज़ें mute कर दी। अब वो तृप्त थी कि अब प्रश्न नहीं थे ....बस ढ़ेर सारा समय और उससे भी ज्यादा आज़ादी थी सबके पास अपने हिसाब से रह आने की ।उन सबको अपने पसंदीदा तरह से जी आने की...लिख लेने की ... अब वो कोई भी पसंदीदा नाम अकेला नहीं लिखती ...साथ में अपने नाम का बस एक फूल जरूर बना देती थी। दिखने वाले Gaps तो किसी से भी भर लो...उदासी से , उजासी से या अक्षरों से। लड़की ने उजास अक्षरों को चुना। खूब लिखने लगी।उसने सबको भीतर भी ना आने दिया और खुद दस्तक भी देती रही । तन्हाई को ढंकने के लिए सांखल नहीं नोंक चाहिए .... हाथ ,आंखें ,आवाज़ें ,कदम सब उसके साये में रहने लगे । उसे पढ़ने लगे। फिर वो लड़की कभी अकेली न हुई। उसके नाम के आगे सब फूल बनाने लगे। कल्पना 💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें