भाषा / Language
इस वक़्त से लड़कर भी क्या करूँगा
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इस वक़्त से लड़कर भी क्या करूँगा ?
जीत भी गया तो ,तारिख मैं क्या लिखूंगा?
जो खुद मुट्ठी से फिसल रहा , रेत बनकर
उसके आगे सर झुका कर ,मैं क्या करूँगा ?
मरासिम नहीं , जिसके इन जज़्बातों यादों से
बादशाह हूँ या फ़क़ीर जताके मैं क्या रहूँगा ?
अंधेरों में तनहा सा जम जाता है जो खुद
आगे ऐसों के कोई फलसफा मैं क्या कहूँगा?
सुख दुःख की जो खुद लेता हो करवटें , बढ़ाकर और सलवटें उसकी मैं क्या हँसूंगा?
बदलना ही फितरत है , तो फिर ऐ खुदा
यूँ वक़्त बेवक़्त सजदे में मैं क्या झुकूंगा ?
मुकम्मल रहूँ या जर्रा जर्रा बिखर जाऊं मैं
वक़्त नहीं ,मेरी कुव्वत है कि मैं क्या बनूँगा?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें