कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1179

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इस वक़्त से लड़कर भी क्या करूँगा

इस वक़्त से लड़कर भी क्या करूँगा ? जीत भी गया तो ,तारिख मैं क्या लिखूंगा? जो खुद मुट्ठी से फिसल रहा , रेत बनकर उसके आगे सर झुका कर ,मैं क्या करूँगा ? मरासिम नहीं , जिसके इन जज़्बातों यादों से बादशाह हूँ या फ़क़ीर जताके मैं क्या रहूँगा ? अंधेरों में तनहा सा जम जाता है जो खुद आगे ऐसों के कोई फलसफा मैं क्या कहूँगा? सुख दुःख की जो खुद लेता हो करवटें , बढ़ाकर और सलवटें उसकी मैं क्या हँसूंगा? बदलना ही फितरत है , तो फिर ऐ खुदा यूँ वक़्त बेवक़्त सजदे में मैं क्या झुकूंगा ? मुकम्मल रहूँ या जर्रा जर्रा बिखर जाऊं मैं वक़्त नहीं ,मेरी कुव्वत है कि मैं क्या बनूँगा?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें