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रचना 1177

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यादें ..... ख़्वाबों की दुल्हन

यादें ..... ख़्वाबों की दुल्हन ये तेरी रुखसती की चुप अब भी मुझ में इतना शोर क्यों करती है ? जब भी कटती है यादों की पतंग उलझकर तेरे ही आगोश में क्यों गिरती है ? बिछडन का वो आखरी तोहफा ..... तेरा मुझे वो "नूर "उतार कर देना मेरा कोरे कागज़ पर आसूं से "अलविदा "कहना सब संजोया रखा है अब तलक कभी सोचता हूँ ...... तुझसे ज्यादा तो तेरी यादें मुझपर फ़िदा हैं तू कह कर भी न लौटी और वो हर बार जाकर लौटती हैं "जाकर आती हूँ " वाला वादा अब तलक निभाती हैं इक तोहफा गीला सा मेरी तकती आँखों के लिए जरूर लाती हैं तुझे अब भूलने लगा हूँ उसी को हमसफ़र कहने लगा हूँ इश्क अब उससे हो चला है वो कभी मेरी दोस्त ,कभी दुश्मन है मेरी मीत , मेरी धड़कन है अब वही मेरी ख़्वाबों की दुल्हन है
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें