भाषा / Language
कितनी कल्पना
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कितनी कल्पना ....
कितना सच......
वो पुरानी वाली औरतें
जितनी कल्पना.....
उतना सच....
ये नई वाली स्त्रियाँ
रात काटी नहीं पाटी गई है.....नाखूनों से खुरच कर
सुख़न लाज़मी है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें