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लौट जाना.....वो भी खुली बाहों वाले दिलबर के पास इससे ज्यादा…

लौट जाना.....वो भी खुली बाहों वाले दिलबर के पास इससे ज्यादा शायद ही कुछ माँगती होगी प्रेमिका। जानती हूँ ... तुम आज फिर वैसे ही चुपचाप मुस्कुराते खड़े होंगे । मेरे लिए हरे हरे चीड़ देवदार पहने हुए। नीला आसमान धोकर मेरे लिए फिर एक बार नया किया तो जरूर होगा। और वो जंगली पहाड़ी फूलों का bouquet ? काफल भरा दोना ...मेरा gift? सुनो... वो ठंडी बयार और छुट पुट वाली बारिश भी तैयार रख दो न। रंगीली धूप का पैमाना पीना है तुम्हारा।रूमान कम न हो जरा भी । रास्ते भर तुम मेरे साथ चलोगे ना ....गले लगकर। एक बार फिर मुझे अपना लो । आ रहीं हूँ ......इस बार दिन नहीं ....हफ़्ते गिनेंगे साथ । लौटना कितना ख्याली है मेरा 😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें