भाषा / Language
मौन के पतझड़ में शब्द के पत्ते गिरते तो हैं.... बस आवाज़ नहीं…
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मौन के पतझड़ में शब्द के पत्ते गिरते तो हैं.... बस आवाज़ नहीं करते ।
कल ये बहार थे .....आज मैंने बुहार दिए ।
बौगेन्विलिया तुम अब भी दिलकश लग रहे।
मेरी नज़रों से देखो।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें