कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 1102

भाषा / Language

कहीं हमारा इश्क़ दिख न जाये इसलिए अब हम अक्षरों में छिपने लग…

कहीं हमारा इश्क़ दिख न जाये इसलिए अब हम अक्षरों में छिपने लगे हैं वो शब्दों से ओट देता है मुझे मैं भी कल्पना से उसे ढांक देती हूँ। किताबें यूँ ही नहीं रूमानी हो जाया करती हैं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें