कल्पनाशब्दों के बीच
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अक्षर वाली हेराफेरी...😊😊

अक्षर वाली हेराफेरी...😊😊 रिश्ते अब बचे कहाँ ? अब तो ये रिसते है एक अक्षर का फेर और सब कुछ बदल गया मेरी वफ़ा को एक अक्षर का इनाम मिला है मैं अब भी सूनी रह गयी ,वो बेवफा बदल गया हिसाब कहाँ रखा ? एक अक्षर और जोड़ा है गिरता चला गया , वो बेहिसाब बदल गया शराब पी , शायद वो ये अक्षर नहीं पढ़ पाया है शबाब पीने लगा , उफ़ ये शराबी बदल गया ज़ार ज़ार चाहा ,ये एक अक्षर दामन में गिरा है आज बेज़ार हूँ , जिंदगी का मायना बदल गया
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें