कल्पनाशब्दों के बीच
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हर दिन के समान ही लंबाई वाला दिन और उतने ही पल भी ......जित…

हर दिन के समान ही लंबाई वाला दिन और उतने ही पल भी ......जितने कल और पिछले कई दिन से रहे होंगे पर कितना कुछ कह गया ये दिन।इकठ्टा करती रही आज आसपास के सभी लोगों का मन। देखिये तो क्या क्या बांध लिया अपने इस लाल दुपट्टे में आज .... काम पूरा क्यों नही करते बेटा ? कौन देखता है तुम्हें घर पर ? और ये क्या कपड़े धुलते नहीं क्या ? माँ कहाँ है? फ़ोन नंबर बताओ? वो चली गयी..... और अब उस नंबर पर सिर्फ गाना बजता है। ........ एक सुंदर सी औरत ....उम्र तीस और पैंतीस के बीच की रही होगी कोई संख्या...यकीनन ।एक कागज मुझे थमा दिया।पढ़ने पर पता चला कि वो अभी कुछ दिन पहले ..... शायद ठीक 45 दिन पहले अपने पति को खो चुकी है। सूनी मांग दिखी फिर उसके आंसू ध्यान से देखे तो......दया नहीं मुझसे नौकरी मांग रहे थे। कुछ भी .....कैसी भी । नज़र मिली तो बगल में खड़ी उसकी प्यारी बिटिया उसकी पुतलियों से झांकने लगी। बोली ....रो कर क्या कर लूंगी? मलहम और नाखून सब लगा रहे मेरे जख्म पर। मैं तो एक पत्थर ढूंढ रही जो कि पुरानी ज़िन्दगी के मुख पर धर सकूं। जीना तो है। ताज़ी विधवा और खालिस सोच। ...... आज फ़ोन पर एक मित्र से बात हुई । कई सालों का रिश्ता पिछले महीने भूकंप में बह गया उनका । रुका तो बस मेरा दोस्त ... उसकी सोच ... उसका सच ... उसकी चाहनाएँ ... और प्यारा सा बेटा। दुख नए घर मे शिफ्ट नहीं करेगा ऐसा वादा मांगा तो है... देखो देगा या नहीं? .......... सहेली मेरी और मैं .....कल्पना हम अक्सर दो min वाला दुख साथ में पकाते हैं। वो मुझे चुटकी भर चख लेती है ... मैं उसकी बातें पचा लेती हूँ। 6 घंटे 8 मिनट का स्कूल का समय और दो मिनट का हमारा सांझा सुख -दुख।दिहाड़ी पूरी। biometry पर उंगली रख कर जाते वक्त अपना अपना दुख दबा जाते हैं। मशीन रोती नहीं ना। .......... उस किसी की सिर्फ आवाज़ सुनकर खुश हो जाना और ये कह देना कि आप मत आइये हम इंतज़ार तस्वीर और शब्दों से पूरा कर लेंगे। सच कहते कहते झूठ बोल देना ... बस यूँही।आधी अधूरी बेवजह की बातें कह देने के लिए उंगलियां फ़ोन पर नहीं दिल पर घुमानी पड़ती है। पसंद है... नकारा जाना।क्या करें? .............. इतने सारे पल दुप्पटे के कोने से बंधे थे आज ।अलग अलग गांठों में। अब खुल गए देखो।लिख दिए ना... दुपट्टा अब भी मुस्कुरा रहा है मुझ पर। मेरे हिसाब से ज़िन्दगी रोज़ chess खेलती है। काले दुख .....सफेद सुखदुख वाले चोकोर।इधर से उठाया उधर ।उधर से उठाया इधर।तो चलो फिर ..... सरकाओ दुख....अहा ज़िन्दगी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें