भाषा / Language
लफ़्ज़ों पर रूह छिड़की नहीं जा सकती ... वो तो बस होती है।
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लफ़्ज़ों पर रूह छिड़की नहीं जा सकती ... वो तो बस होती है।
लिखते लिखते लफ़्ज़ों को आप की शिद्दत दिखने लगती है और वे न चाहते हुए भी आपकी कलम को इशारे देने लगते हैं।
एक पल का प्यार नहीं होता लेखनी। ये रोज़ाना वाला इश्क़ है।
लिखते रहें.... लिखते रहें... बस लिखते ही रहें।
गुलाब कभी नहीं कहता मेरी महक देखो
हरश्रृंगार कभी नहीं कहता मुझे उठा लो
जो खिंचा चला आये ......वो आपका
😊😊😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें