भाषा / Language
तुझ से उठकर ,तुझमें डूब जाती हूँ
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तुझ से उठकर ,तुझमें डूब जाती हूँ
ये जूनून है ,तू तो इश्क ही बताएगा
दिल सुन्न है ,नब्ज़ भी कुछ कहती नहीं
क्यों तूने कहा मुझमें ठहर ही जायेगा ?
मासूम से ख्वाब , हैं जिद्दी भी बहुत
बुलबुलों का महल ,सब्र से ही पायेगा
सुराखों वाला हो गया है ,इंसानी दिल
जिसे देखो ,"खाली नज़र " ही आएगा
जीकर सीखना है ये मुश्किल बहुत
सीखकर जिया ,तो बशर कहलायेगा
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें