भाषा / Language
मुझमें अब तक तू ही गुजर रहा है
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मुझमें अब तक तू ही गुजर रहा है
तू ही वक़्त , तू ही सफ़र रहा है
बेहिसाब जख्म हैं ,तेरे नाम के
मलहम भी तू ,तू ही सबर रहा है
बुलबुला तेरी याद ,का जिद्दी है
जितना दबाऊं ,उतना उभर रहा है
फैला काजल ,नैन कुछ कहते नहीं
कुछ नाराज सा ,आँखों से झर रहा है
कुछ तो बात जरूर है हम में आज
सूरज देख ,चाँद भी जीना उतर रहा है
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें