भाषा / Language
कब तक फिसलते रहोगे .....इस शाम की तरह
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कब तक फिसलते रहोगे .....इस शाम की तरह
कब तक चलते रहोगे ..........इस चाँद की तरह
लाओ........अपने शब्दों का लंगर डाल देती हूँ
तुम्हें .........डायरी में रोक देती हूँ l
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें