कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0980

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कब तक फिसलते रहोगे .....इस शाम की तरह

कब तक फिसलते रहोगे .....इस शाम की तरह कब तक चलते रहोगे ..........इस चाँद की तरह लाओ........अपने शब्दों का लंगर डाल देती हूँ तुम्हें .........डायरी में रोक देती हूँ l
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें