कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0953

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बहकने के लिए तो बाज़ार पड़ा है

बहकने के लिए तो बाज़ार पड़ा है ..... बस शिफ़ा और शफ़क़ तुम्हारे शब्दों में मिलता है। किसी रोज़ मन कहूंगी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें