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रचना 0930

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दिन के हर सफ़हे को .....पलट पलट के देखा

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दिन के हर सफ़हे को .....पलट पलट के देखा सारी शाम को .....खरोंच खरोंच के देखा इस रात को .......उधेड़ कर रख दिया हैरत में हूँ … तुम कहीं नहीं मिले नाराज़ हो क्या ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें