भाषा / Language
खिड़कियों से एक रोज़ बयार आयी
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खिड़कियों से एक रोज़ बयार आयी .....
फिर अगले ही दिन बहार
धीरे धीरे सीख, सोच और सलीका आने लगा
कुछ रोज़ बाद नज़रिया और प्रतिबंध चले आये
लो ...अब उलाहना और लांछन आना शुरू हो गया
कितने ही दिनों तक चीख.... दर्द .....विद्रोह आता रहा
और फिर एक दिन ....
वो हद चली आयी .......एक ताज़ी सी खबर में लिपटी
ये कैसे घरौंदे रख छोड़े हैं हमने बेटियों वाले
जिसमें दर तो था ही नहीं कभी
दरख्वास्त तक नहीं छोड़ी हमने ।
कुछ खिड़कियां थी ....
वो भी अंदर ही बंद होने वाली
सांस एक तरफा कब तक जिंदा रखेगी
अब तो दांव खेलना होगा ....
आखिरी वाला
शून्य के आगे अंक लगाने का समय आ गया
अब पूजा नहीं होगी ....
सिर्फ प्रसाद बंटेगा
हुँकार वाला ....
दर भी खुले और अब डर भी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें