कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0896

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सुनो

सुनो...... जानते हो ये तुम्हारा वाला पूर्णविराम इतना गहरा क्यों है? क्योंकि इसमें मेरे बहुत सारे अल्पविराम है जो तुम्हारी नज़रों के सामने से गुजरे तो सही पर टिक नहीं पाए ... आखिरकार धुंधला गए। दिन में रात को तो हो ही जाना था एक दिन। पूर्णविराम के बाद वाली रात अब भी इतनी काली नहीं हुई है ... देखो मेरे अल्प विराम वाले सितारे अब भी ज़रा ज़रा टिमटिमा रहे। चाँद सुनो ना.....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें