भाषा / Language
कुछ चिट्ठियों को कितनी भी सेक दो ना वो शब्द उभरते हैं ना शख…
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कुछ चिट्ठियों को कितनी भी सेक दो ना वो शब्द उभरते हैं ना शख्स। उम्र ही नहीं प्रेम भी अपने पन्ने पलटता है।कभी अगले कभी पिछले कई सारे। आगे के कुछ पन्ने हमेशा छोड़कर अपनी कहानी बढ़ाता है ।
क्यों? पूछ कर देखिये खुद से।
हर मनचाहा शख्स आपकी कहानी में किरदार ही निबाहे जरूरी तो नहीं।कुछ बस यूँही फेरा लगाने आते हैं ....रुकने नहीं। हाँ...उनके नाम कुछ शब्द जरूर कहानी में शामिल हो जाते हैं। वो खाली पन्ने उन्हीं से भरते जाते हैं।
किताब में कहानियां होती हैं ..तो किस्से भी तो होते हैं..छोटे छोटे कुछ मुकम्मल कुछ फ़िज़ूल।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें