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रचना 0883

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तुम्हें आखरी बार मुझमें से जाते हुए देखना फिर भी आसान था पर…

तुम्हें आखरी बार मुझमें से जाते हुए देखना फिर भी आसान था पर ये जो संजोये पल तुम मेरे हथेलियों में दबा गए हो और वो तुम्हारी तमाम आधी कच्ची आधी पकी नज़्में...उनको कहां सजाऊँ। टेबल पर रखी तुम्हारे नाम की डायरी खुली नहीं आज तक पर हर पल... हर याद दर्ज़ है सिलसिलेवार ।ब्यौरा है इस बात का कि किसी के जाने के बाद कहीं जाया ही नहीं जाता।बस वहीं जम जाना होता है। बताओ क्या ये आसान है... जाना भी और रुके भी रहना ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें