कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 0868

भाषा / Language

मैं अटारी पर रखी रोशनी ही हूँ

मैं अटारी पर रखी रोशनी ही हूँ ... ये तो तुम्हारी सहूलियत है कि तुम मुझे दिन के उजियारे में दमकता कम ..... रात की कालिख में टिमटिमाता देख कर खुशी जाहिर करते हो। मैं भी खुश हो लेती हूँ.... जवाब नहीं मांगती ना रोशनी । सुकून में रहो जिस रोज़ तक दीये कि लौ ताप नहीं बनती। ताप रात दिन नहीं देखता .... बस झुलसा जाता है। जरा खुद को बचा के चलना मुझसे उस रोज़। अब किसी रोज़ तो शब्द खर्च करूँगी ना? अटारी पर शब्दों की ढेरियां भी तो जमा है रोशनी वाली अलग और ........वो ताप वाली अलग।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें