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रचना 0859

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दिन की फाँक काट काट कर तो बाँट ही देती हूँ

दिन की फाँक काट काट कर तो बाँट ही देती हूँ .... चलो अब रात इंच इंच मुझे भर लेने दो। खाली मैं बंटती भी तो नहीं ...... मैं... कौन ? कौन मैं...?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें