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रचना 0844

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कैसे हिलाऊँ मैं अपनी जीत का प्यादा

कैसे हिलाऊँ मैं अपनी जीत का प्यादा ..... मैं तो देख सकने वाला अँधा हो गया हूँ सामने वर्त्तमान का सच पड़ा है और मैं अतीत और भविष्य अँगुलियों से टटोल रहा हूँ कैसे हिलाऊँ मैं अपनी जीत का प्यादा ..... मैं तो सुन सकने वाला बहरा हो गया हूँ सामने कोई सच बोल रहा है ..... और मैं अपने कानों में भ्रम उड़ेल रहा हूँ कैसे हिलाऊँ मैं अपनी जीत का प्यादा ...... मैं तो बोल सकने वाला गूँगा हो गया हो सामने शब्द ही भिड़ा रहा हूँ और खुद अर्थ का अनर्थ बना रहा हूँ जीत तो होगी बाद में .... Detoxification...... करना होगा पहले
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें