कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0828

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दिन भर के काम से निपटी ,खिड़की से पर्दा हटा के बस बिस्तर पे…

दिन भर के काम से निपटी ,खिड़की से पर्दा हटा के बस बिस्तर पे लेटी ही थी तो देखा चाँद टंगा खड़ा था I आँखों के ठीक सामने I पसीने - पसीने , हांफ भी रहा था शायद I महसूस हुई उसकी धकधक वाली सांसें I मैंने इशारों से पूछा....यहाँ कैसे ? सकपकाया सा बोला .....बस जैसे तैसे ! मैं लेटी लेटी मुस्कुराती रही I शायद उसे भी मैं ऐसे ही भाती रही I बिना लफ्ज़ , बिना लब हिले बात करने का हुनर सीखता रहा और उसकी हर अदा पर मेरा भी मन पसीजता रहा | ऑंखें नींद में मदहोश हो गयी | तभी कुहनी मार के चाँद बोला ....सुनो सो गयी ? सुबह आँख खुली , तो सिरहाना शीतल था अब तलक | जा चुका था चाँद तब तलक | खिड़की के बाहर अजीब हलचल थी | पता चला चाँद की रात भर गुमशुदगी थी | सारे तारे लड़ लिए थे आपस में ..........की मेरा चाँद तेरे सिरहाने तो नहीं पहुँच गया कल ? और वो .....मुआं ....सूरज मंद मंद मेरी कुहनी की तरफ जाने क्या - क्या इशारे कर रहा था | कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें